
आइए आज कुछ चर्चा वर्तमान समाज में शिक्षा के ऊपर। वैसे भी पिछला शैक्षणिक सत्र समाप्त हो चुका है, विद्यार्थियों को नए सत्र में प्रवेश लेना है। परंतु शिक्षा के मूलभूत बातों पर विचार में करने के लिए उपस्थित हुआ हूं। हमारे बच्चों को दी गई, या हमारे युवा पीढ़ी को दी जाने वाली शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या है ? यदि आप यह समझते हैं, मेरा बच्चा अथवा विद्यार्थी पढ़ लिखकर, अच्छे पैसे कमा सके, और यह शिक्षा उसके लिए एक सीढ़ी है। तो मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है, यह विचार बहुत क्षुद्र है। हो सकता है किसी समय यह विचार ठीक रहता हो, तब सामाजिक स्थिति और परिवेश संभवत अलग-अलग थे । पर क्योंकि आज बदल चुका है, हमें इस पर और अधिक चिंतन करने की आवश्यकता है।
पहले आप तीन शब्दों को सीखें, जिसमें पहले तो है साक्षरता, दूसरी है शिक्षा और तीसरी है विद्या। साक्षरता जैसा के नाम बताता है, अक्षरों अथवा भाषा को लिखे हुए लिपि को पहचानने का तरीका, अथवा एक विशेष लिपि में आप कुछ लिख सके अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकें, यही मुख्यत: साक्षरता है। अब शिक्षा शब्द का प्रारूप, सीखने से आता है। विद्यार्थी जिस स्थान पर शिक्षा लेने जाता है उसे वहां पर शिष्य कहा जाता है। शिक्षा देने वाले को हम गुरु कहते हैं। परंतु यहां भी समझना चाहिए की जो आज स्कूली शिक्षा हमें मिल रही है उसको देने वाले गुरु नहीं अभी तो अध्यापक है। अध्यापक का अर्थ है वह निश्चित अध्याय पढ़ते हैं, जो दुर्भाग्य से आज प्रशासन निर्धारित करता है। मात्र उसी में पढ़ने में हम अपने बच्चों को पारंगत करते हैं। यही सभी विद्यालयों का मुख्य उद्देश्य बनकर रह गया है। इसके अंत में बात आती है विद्या की, यह निश्चित है की साक्षरता और शिक्षा के बाद ही विद्या आएगी। परंतु जीवन में यह विद्या ही आपके काम आती है। यह भी सत्य है की साक्षरता और शिक्षा के बिना विद्या आ नहीं सकती।
दुर्भाग्य से हमारी शिक्षा प्रणाली के अंदर, बच्चों को निश्चित अध्याय अध्यापक पढ़ाता है। परंतु उसमें किसी भी हालत से बच्चे को सोचने/तार्किक क्षमता विकास पर बल नहीं किया जाता, अभी तो यह समझाया जाता है कि जो हमने तुम्हें कह दिया इसी को तुम्हें प्रश्न पत्र में लिखना है। अब आप किसी को रटना सकते हैं, दरअसल हमारे बच्चे की प्रतिभा को नापने का यंत्र हमारे पास जो है, वह ऐसी ही परीक्षा प्रणाली है जिसमें बच्चों की स्मरण शक्ति को ही देखा जाता है। कुछ हद तक बच्चे की तर्क की बौद्धिक क्षमता को भी नापा जाता है। इसमें स्मरण शक्ति का लगभग 80% योगदान होता है और तर्क शक्ति का 20% योगदान। जब के जीवन में काम आने वाली विद्या, जिसे आप skill अथवा कौशल भी कह सकते हैं, का ही योगदान सर्वाधिक होता है। और यदि आपके पास कोई डिग्री है, स्नातक है, परास्नातक हैं यहां तक की PhD की डिग्री में आपके पास है, और तो उसे सभी शैक्षिक योग्यताओं का विद्या में नहीं बदल सकते, तो जीवन में कम से कम स्वयं दीर्घकालीन सुखी तो नहीं हो सकते।
दो बार मनोविज्ञान में PhD करने वाले को अपना मनोविज्ञान समझ नहीं आता है, अपने परिवार का समझ नहीं आता है अपने समाज का समझ नहीं आता है। इसी प्रकार दो-दो बार समाज शास्त्र में PhD करने वाला अपना घर परिवार और समाज बेहतर नहीं कर पाता। आपकी अर्थशास्त्र की कितनी भी पढ़ाई हो आप उसे अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर नहीं कर सकते। इसलिए जो यह विषय पढ़ाए जाते हैं यह सिर्फ इस रूप में कि उसे विषय की डिग्री के बाद आप एक अच्छी नौकरी कर सके और वहां से पैसा कमा कर अपना घर परिवार चला सके। यदि घर परिवार को पैसे से चलना ही आपकी शिक्षा का मूल उद्देश्य है, तो जीवन में आप कुछ भी कर लेंगे कुछ क्षणों के लिए सुखी भी हो जाएंगे, आप भौतिक सुविधा से तो अपने को संपन्न शायद कर भी लेंगे परंतु मानसिक सुख इससे भी नहीं मिलेगा। क्यूंकि मानव जैसा परिभाषित ही है मन से संचालित होता है ।
जब कोई अभिभावक अपने बच्चों के लिए शिक्षक ढूंढता है, अथवा विद्यालय का चयन करता है तो वह मात्र इतना देख पता है कि इस विद्यालय से अथवा ही शिक्षक से आने वाले बच्चों के कितने कितने अंक आए हैं। उसे विषय का मूलभूत ज्ञान कितना है इस पर हम ध्यान नहीं देते, जबकि जीवन में विषय का मूलभूत ज्ञान ही काम आएगा। जैसे मैंने आपको बताया कि हमारे स्मरण शक्ति की परीक्षा होती है कुछ हद तक तर्कशक्ति का भी योगदान है। इससे वह विद्यार्थी समस्त सूचनाओं तो जुटा लेता है, परंतु उन सूचनाओं का सदुपयोग करने की क्षमता उसमें नहीं आ पाती। यही इस शिक्षा का मूलभूत त्रुटि है।
कल्पना करें हम लोग एक विषय बताते हैं सामान्य ज्ञान, पूरे भारत में कहीं से भी पुस्तक ले लीजिए सामान्य ज्ञान के नाम पर सामान्य सूचनाओं हैं। किसी देश की क्या राजधानी है, किसी देश की क्या मुद्रा है, किसी देश में जनसंख्या कितनी है, वहां पहाड़ कितने हैं नदियां कितनी है इत्यादि इत्यादि । और आज यह सारी की सारी सूचनाओं इंटरनेट पर उपलब्ध है। जिस बच्चे को अपने रट पर पारंगत कर भी दिया, उसकी सारी सूचनाओं इंटरनेट पर उपलब्ध है।
एक कथा को कहीं पढ़ा था, पता नहीं सच्चाई क्या थी। एक व्यक्ति नदी के किनारे रहते हुए बहुत साधना करता है, और कई वर्षों की साधना के बाद वह नदी पर चलने की क्षमता विकसित कर लेता है। एक दूसरा व्यक्ति वहां से निकलता है, पहला व्यक्ति गर्व से उसे बताता है कि मैं 10 वर्षों की तपस्या के बाद नदी पर चलना सीख लिया। दूसरा व्यक्ति उसे कहता है तुमने अपने 10 वर्ष का जीवन उसे काम की ओर लगा दिया जिस काम के लिए नाविक ₹ 5 लेकर नदी पार कर देता है। क्या यह माना जाए तुम्हारे 10 वर्षों की तपस्या ₹ 5 के बराबर है।
कहने का का यह अर्थ कदापि नहीं है क्या आप अपने बच्चों को चिकित्सा, अभियंता, लेखाकार इत्यादि ना बनाएं, आज जीवन होने की आवश्यकता है जिससे वह रोजी रोटी कमाएंगे, समाज में सम्मान पाएंगे, बहुत ही सुखों का सामान जुटा पाएंगे। परंतु वास्तविक प्रसन्नता के लिए वास्तविक सुखों के लिए, उसके लिए यह बहुत आवश्यक है कि ली गई शिक्षा तो वह अपने बौद्धिक विकास के साथ जीवन में धारण कर सके। इस शिक्षा को नकारा नही जा रहा है, अपितु कहने का अर्थ है कि यह अभी पूर्ण नहीं है । अभी यात्रा शेष है । अभी तक यह हमें कुछ सीमा तक सापेक्ष आँकलन के लिए तैयार करता है जबकि आवश्यकता निरपेक्ष आँकलन की है ।
हो सकता है किसी एक समय पर उसके अंक काम आ जाए बहुत अच्छा कॉलेज उसको ना मिले लेकिन यदि जीवन में मूलभूत विषयों की जानकारी उसकी होगी, तो एक तो वह अपनी क्षमता पर प्रसन्न रहना सीखेगा। और दूसरा वह जो भी करेगा अपने जीवन में अपनी आत्म संतुष्टि के साथ जिएगा। तो इस पूरी बात में शिक्षकों और अभिभावकों के लिए क्या संदेश है उसे पर मैं चर्चा अपने दूसरे भाग में करूंगा धन्यवाद।